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Azaadi ki goonj

सदियों की काली रातों में जब भारत माँ रोई थी,

हर एक साँस गुलामी के तीखे ज़हर में खोई थी।

माटी की छाती छलनी थी, हर आँख से आँसू बहते थे,

अपने ही घर में सब बेबस, घुट-घुट कर ज़ुल्म को सहते थे।

जलियाँवाला बाग़ का वो मंज़र, पत्थर भी थर्राया था,

गोलियों की बौछारों ने जब चीखों का शोर मचाया था।

माँओं ने अपने बच्चों को सीने से कस के भींच लिया,

उस दिन इस पावन धरती को मासूम लहू ने सींच लिया।

अंडमान के पत्थरों से पूछो, कितनी आहें दफ़्न हुईं,

कोड़ों की हर एक मार तले, कितनी जवानी ख़त्म हुई।

पर शीश नहीं झुकने पाए, वो पाषाणों से टकराए,

फाँसी के फंदों को चूमकर, हँसते-हँसते बलिदानी गाए।


इक माँ ने अपने लाल को भेजा था सरहद की राहों पर,

सपनों का सेहरा बाँध रखा था उसकी चौड़ी बाहों पर।

कहकर गया था बेटा— "माँ, मैं जल्द ही वापस आऊँगा,

जीत के इस तिरंगे को मैं तेरे आँगन लाऊँगा।"

पर चिट्ठी नहीं, इक दिन घर पर भारी ताबूत उतर आया,

काँपते हाथों ने माँ के, जब कफ़न का कोना हटाया।

पथरा गई आँखें पल भर को, कलेजा मुँह को आ बैठा,

जिस गोद में खिलता था बचपन, वो लाल तिरंगे में सो बैठा।

ज़रा पूछो उस दुल्हन से, जिसके हाथों की मेंहदी न सूखी थी,

माँग का सिंदूर लुट गया जब, वो अंदर से कितनी टूटी थी।

पहनी थी उसने चूड़ियाँ जो, वो पल में काँच सी बिखर गईं,

पति की अंतिम छवि आँखों में, अश्कों के साथ उतर गईं।

और वो नन्ही सी गुड़िया, जो दरवाज़े पर खड़ी ताकती रही,

"पापा कब आओगे?" कह-कह कर, रातों को रोकर जागती रही।

उसको तो ये भी मालूम नहीं, शहादत का मतलब क्या होता है,

जब बाप तिरंगे में लौटे, तो पूरा देश ही रोता है।


माइनस चालीस डिग्री में, जहाँ साँसें जम-जम जाती हैं,

सियाचिन की उन चोटियों पर, केवल बंदूकें गाती हैं।

जब हम अपने कमरों में मीठी नींद में सोते हैं,

सरहद पर पहरेदार खड़े, अपनों की याद में रोते हैं।

सीने पर जब दुश्मन की पहली गोली आकर लगती है,

आँखों के आगे बूढ़े पिता की मद्धम मूरत जगती है।

मुँह से 'आह' नहीं निकलती, बस 'जय हिंद' की गूँज सुनाई दे,

अंतिम हिचकी में भी उसको, भारत माँ का चेहरा दिखाई दे।

वो गिरते हैं ताकि हमारा शीश कभी झुकने न पाए,

वो जलते हैं ताकि हमारे घर का दीप बुझने न पाए।

उन्हें कोई लालच नहीं था धन का, न पदवी की कोई चाहत थी,

मिट्टी के बेटे थे वो बस, माटी ही उनकी इबादत थी।


ये केसरिया केवल रंग नहीं, उन शहादतों की ज्वाला है,

जिसने हर एक मतवाले के मन में अंगार को पाला है।

ये श्वेत रंग उन विधवाओं के टूटे सपनों की पावनता है,

और बीच का चक्र सिखाता, वीरों की अमर निरंतरता है।

ये हरा रंग उन खेतों का, जो वीरों के ख़ून से लहलहाए,

यह परचम ऐसे नहीं बना, जो यूँ अंबर में लहराए।

हर सूत में इसके गुंथा हुआ, हज़ारों माताओं का रोना है,

इस आज़ादी को पाकर हमने, बहुत कुछ अनमोल खोया है।


हाँ, सीना गर्व से फूलता है, जब हम भारतीय कहलाते हैं,

पर आँखें भी भर आती हैं, जब वो क़ुर्बानियाँ दोहराते हैं।

हम उस देश के वासी हैं, जहाँ की माटी भी चंदन है,

हर उस अज्ञात शहीद को, मेरा कोटि-कोटि वंदन है।

ऐ मेरे वतन के लोगों, कभी उनके मोल को कम न होने देना,

जिन आँखों ने सपने देखे थे, उनको कभी नम न होने देना।

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