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भक्ति प्रेम

काष्ठ की देह में बैठे प्रभु,

पर हृदय आज भी धड़कता है।

नीलाचल की खामोशी में,

मेरा रोता मन सुनता है।

तेरी आँखें गोल सही,

पर दृष्टि अनंत है।

तू देख लेता है

वो भी… जो कहा नहीं जाता है।

कलियुग ने तेरे नाम को भी

मूल्य-पट्ट पर टाँग दिया।

भक्ति ने सिर झुकाया,

व्यापार ने हाथ बढ़ा दिया।

फिर भी तेरे रथ के नीचे,

आज भी सब समान हैं।

राजा, रंक, दोषी, टूटे—

तेरे आगे बस इंसान हैं।

हे जगन्नाथ!

अगर तू साथ है,

तो भीड़ से क्या डर।

मेरा विश्वास ही मेरी पूजा है,

और मेरा प्रेम—

तेरी सबसे बड़ी भेंट। 🌼

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