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कलयुग की लीला

कलियुग में भी तू ही आधार,

हे नीलाचल के नाथ अपार।

हाथ जुड़े हैं द्वार पे तेरे,

पर भाव से ज़्यादा सौदे भारी आज।

भीड़ बहुत है तेरे आँगन में,

पर मौन है मन, खाली अंतःकरण में।

माँगों की पर्ची, दामों की बोली,

भक्ति भी अब तराज़ू पर तोली।

कहीं दर्शन का मूल्य लिखा है,

कहीं प्रसाद का हिसाब बिका है।

जो न दे पाए, वो दूर खड़ा,

क्या तू भी प्रभु अब मूल्य में बँधा?

हे जगन्नाथ! तू तो वही है,

जो विदुर के घर साग खाए।

न सोना देखा, न चढ़ावा,

बस प्रेम ने तुझको बुलवाया।

आज मंदिर भव्य, दीपक भारी,

पर आँखों में क्यों दिखती लाचारी?

भगवान के नाम पर धंधा क्यों,

श्रद्धा के संग यह फंदा क्यों?

फिर भी आशा है तेरी करुणा पर,

क्योंकि तू न बिके सिक्कों पर।

तू तो बस भाव पहचानता है,

टूटे दिल को ही अपनाता है।

हे दारु ब्रह्म! हे जग के स्वामी,

इस कलियुग में बस इतना दे जाना—

भक्ति रहे निर्मल, निश्छल, सच्ची,

और भगवान तक पहुँचे बिना कीमत की सीढ़ी।

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