Bhumika saxena
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क्या मैं पार्वती बन पाऊँगी?
एक द्वंद्व है मन के भीतर, एक मौन सा शोर उठता है, जब भी उसकी आँखों में, कोई गहरा सा वैराग्य दिखता है। मैं दुनिया की रस्मों में, उलझी हुई एक कोमल कली, वो शून्य के विस्तार सा, हर बंधन से है मुक्त—बली। मेरे मन की देहरी पर, एक ही सवाल ठहर जाता है, कि "अगर वो शिव हुआ, तो क्या मैं पार्वती बन पाऊंगी?" क्या मुझमें वो सामर्थ्य है, जो उसके क्रोध को अमृत कर दे? क्या मेरी निश्छल ममता, उसके एकांत को खुशियों से भर दे? वो गंगा की तीव्र धारा सा, मैं शांत तट की मिट्टी हूँ, वो संपूर्ण ज्ञान का



















