कलयुग का अनुभव
- Bhumika saxena
- Jan 23
- 1 min read
मंदिर गए थे…
भगवान से कुछ माँगने नहीं,
बस सिर झुकाने।
न थाली थी,
न दान का भार,
मन ही मन कह दिया—
“सब ठीक रखना।”
बाहर आए…
तो रास्ते में मिले
कुछ ऐसे चेहरे
जो बोल नहीं सकते थे,
पर उनकी आँखें
सब कह रही थीं।
भूख थी,
उम्मीद थी,
और एक नज़र
जो इंसान होने पर भरोसा कर रही थी।
फल लेने दुकान पहुँचे,
तो शब्द पत्थर बनकर गिरे—
“मंदिर में पूजा नहीं करवाई,
इसलिए कुछ नहीं देंगे।”
उस पल समझ आया—
भगवान शायद
पीछे मंदिर में रह गए,
और इंसान आगे नहीं आ पाया।
क्या दया भी अब
रसीद माँगती है?
क्या भूखे को मदद देने से पहले
पूछा जाता है—
किसने कितनी पूजा की?
उन मासूम आँखों में
मैंने भगवान को देखा,
पर दुकान की ज़ुबान ने
उसे पहचानने से इंकार कर दिया।
हे प्रभु…
अगर यही पूजा का नियम है,
तो मुझे पूजा नहीं आती।
मुझे बस इतना पता है—
जहाँ कोई भूखा है,
वहीं तू खड़ा है…
और वहीं मेरा मंदिर है।



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