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क्या मैं पार्वती बन पाऊँगी?

एक द्वंद्व है मन के भीतर, एक मौन सा शोर उठता है, जब भी उसकी आँखों में, कोई गहरा सा वैराग्य दिखता है। मैं दुनिया की रस्मों में, उलझी हुई एक कोमल कली, वो शून्य के विस्तार सा, हर बंधन से है मुक्त—बली। मे

 
 
 
भक्ति प्रेम

काष्ठ की देह में बैठे प्रभु, पर हृदय आज भी धड़कता है। नीलाचल की खामोशी में, मेरा रोता मन सुनता है। तेरी आँखें गोल सही, पर दृष्टि अनंत है। तू देख लेता है वो भी… जो कहा नहीं जाता है। कलियुग ने तेरे नाम

 
 
 
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