भक्ति प्रेमकाष्ठ की देह में बैठे प्रभु, पर हृदय आज भी धड़कता है। नीलाचल की खामोशी में, मेरा रोता मन सुनता है। तेरी आँखें गोल सही, पर दृष्टि अनंत है। तू देख लेता है वो भी… जो कहा नहीं जाता है। कलियुग ने तेरे नाम
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