क्या मैं पार्वती बन पाऊँगी?
- Bhumika saxena
- May 18
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एक द्वंद्व है मन के भीतर, एक मौन सा शोर उठता है,
जब भी उसकी आँखों में, कोई गहरा सा वैराग्य दिखता है।
मैं दुनिया की रस्मों में, उलझी हुई एक कोमल कली,
वो शून्य के विस्तार सा, हर बंधन से है मुक्त—बली।
मेरे मन की देहरी पर, एक ही सवाल ठहर जाता है,
कि "अगर वो शिव हुआ, तो क्या मैं पार्वती बन पाऊंगी?"
क्या मुझमें वो सामर्थ्य है, जो उसके क्रोध को अमृत कर दे?
क्या मेरी निश्छल ममता, उसके एकांत को खुशियों से भर दे?
वो गंगा की तीव्र धारा सा, मैं शांत तट की मिट्टी हूँ,
वो संपूर्ण ज्ञान का ग्रंथ है, मैं एक छोटी सी चिट्ठी हूँ।
पार्वती बनना आसान नहीं, खुद को तप की आग में झोंकना होगा,
दुनिया के हर ताने को, अपनी भक्ति के बल पर रोकना होगा।
जब वो समाधि में खोया हो, मुझे धैर्य की मूरत बनना है,
जब वो दुनिया से रूठा हो, मुझे उसका घर-संसार बनना है।
क्या मैं युगों-युगों तक, उसकी एक आहट की प्रतीक्षा करूँगी?
क्या मैं उसके भस्म-रंगे स्वरूप का, मन से वरण करूँगी?
सती का आत्मदाह और फिर उमा का वो कठिन संकल्प,
शिव को पाने का रास्ता प्रेम नहीं, है पूर्ण समर्पण का विकल्प।
अगर मेरे प्रेम में वो ज़िद है, कि वो पत्थर भी पिघल जाए,
अगर मेरी श्रद्धा ऐसी है, कि उसकी समाधि भी हिल जाए,
तो हाँ, मैं उसके अर्धनारीश्वर का आधा हिस्सा कहलाऊँगी...
तब शायद मैं विश्वास से कह सकूँगी—
कि "अगर वो शिव हुआ, तो मैं ही पार्वती बन जाऊँगी।"


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